नमस्कार

आज के अपने इस ब्लॉग में मैं बात करूँगी समाज की विचारधारा पर जो स्त्रियों के विषय में अधिकतर नकारात्मक ही रहती हैं। मेरे यह विचार सभी के लिए नहीं हैं। यह ब्लॉग उन लोगो के लिए जरूर हैं जो हर बात पर स्त्री को ही दोषी सिद्ध करते हैं। जैसे- बात घरेलू हिंसा की हो तो भी स्त्री की कोई गलती रही होंगी तभी तो पति ने मारा। बात बलात्कार की हो तो स्त्री का पहनावा ही गलत था जैसे दकियानूसी खयाल वाले लोग अपनी राय समय समय पर देते रहते हैं। कुछ एक तो स्त्री शिक्षा को ही गलत कह देते हैं। ऐसे लोगो का मानना होता हैं कि शिक्षित महिला को दबाया नहीं जा सकता ,इसलिए ज़्यादा शिक्षित होना भी उचित नहीं।ऐसी बातों पर मुझें दुःख तो होता ही हैं लेकिन हँसी भी बहुत आती हैं ऐसी मानसिकता वाले लोगो पर। क्योंकि ये कुँए के मेंढक सिर्फ टर्राना ही जानते हैं। ऐसे लोग समाज की बड़ी चिंता करते हैं पर ये ही समाज के लिए सबसे अधिक घातक होते हैं। ऐसे ही लोग जब अपने प्रयासों में विफल होते हैं तब एसिड अटैक या फिर झूठी अफवाहों से किसी भी स्त्री की छबि धूमिल करने का दुस्साहस करते हैं। महाभारत के समय भी महारानी द्रौपदी के साथ जो हुआ वह भी एक पुरुष के अहम को ठेस पहुँचने के कारण ही हुआ। आज भी जो अपराध हम सुनते ,पढ़ते या देखते हैं उसका कारण नहीं बदला। बातें तो बहुत सी हैं औऱ हर बार पुरुष ही गलत हो मैं ये भी नहीं कह रहीं। लेकिन अधिकांश मामलों में पुरुष ही गलत होते हैं। मैं कथा के माध्यम से अपनी बात को समाप्त करती हुँ -
एक समय की बात हैं गौतमबुद्ध अनेक क्षेत्रों की यात्रा करते हुए एक गांव में ठहरे। बुध्द के आगमन की सूचना पाते ही ग्रामवासियों की भीड़ लगने लगीं। सभी की यह इच्छा थीं कि गौतम बुद्ध उनके घर का आतिथ्य स्वीकार करें।बुध्द जी के पास गाँव की एक स्त्री आई । वह युवा बुद्ध को देखकर उनसे कहती हैं आप तो राजकुमार की भांति जान पड़ते हैं। फिर इस युवावस्था में सन्यासी होने के पीछे क्या कारण हैं ?
कृपा करके आप मुझें मेरे प्रश्न का उत्तर देवे।
बुद्ध ने मुस्कुराते हुए उस स्त्री से कहा - मेरा यह जो सुंदर शरीर हैं यह भी वृद्ध हो जायेगा, फिर इसे भी बीमारी घेर लेगी और अंत में यह मृत्यु को प्राप्त हो जाएगा। मुझें वृद्धावस्था , बीमारी औऱ मृत्यु के कारण को ही जानना हैं। इसके विषय में ज्ञान प्राप्ति के उद्देश्य से ही मैंने सन्यास ग्रहण किया हैं। बुद्ध की वाणी सुनकर वह स्त्री उनसे बहुत प्रभावित हुई और उसने बुद्ध को अपने घर भोजन के लिए आमंत्रित किया।यह बात पूरे गांव में जंगल की आग की तरह फैल गई। गांव वासी बुद्ध के पास गए और उनसे निवेदन करते हुए कहने लगे - तथागत आप उस स्त्री के घर का भोजन ग्रहण करने न जाए।
बुद्ध ग्रामीणों से इसका कारण पूछते हैं।
तो ग्रामवासि कहते हैं - महात्मन ! वह स्त्री चरित्रहीन हैं।
बुद्ध ने गांव के मुखिया से पूछा - आप को भी यहीं लगता हैं ,की वह स्त्री चरित्रहीन हैं ?
मुखिया ने कहा - जी भगवन ! वह स्त्री अच्छे चरित्र की नही हैं। आपको उसके घर भोजन ग्रहण करना उचित नहीं हैं।
बुद्ध ने मुखिया का एक हाथ पकड़कर कहा- की आप ताली बजाइये।
मुखिया ने कहा - यह सम्भव नहीं हैं तथागत।
तब बुद्ध ने कहा - तो कैसे एक अकेली स्त्री चरित्रहीन हो गई ? अगर आप सभी चरित्रवान होते तो वह स्त्री भी आज ऐसी न होती।आप सब भी उसके चरित्र के लिए जिम्मेदार हैं।
यह सुनकर उपस्थित सभी ग्रामवासी के सर शर्म से झुक गए।
यह बात तो गौतम बुद्ध जैसे पुरूष के मुख से ही सम्भव हैं क्योंकि वर्तमान में तो हमारे समाज के पुरूष बहुत गर्व महसूस करते । इस पुरूष प्रधान समाज में महिला या तो देवी हो जाती हैं या पैरों की जूती। आज के समाज में महिला को इंसान कहाँ माना जाता हैं। महिलाओं के साथ लगातार हो रही आपराधिक घटनाएं तो उपरोक्त बात को ही सही सिद्ध करती हैं कि महिला इंसान नहीं हैं उपभोग का साधन मात्र हैं। पुरूष विवाहित होकर भी पराई स्त्री से प्रेम करने के लिए स्वतंत्र हैं, उस पर कोई कुछ कहता भी नहीं। दुःख तो तब होता हैं जब महिला ही कुछ ऐसा कह देती हैं कि अरे हम पुरुषों की बराबरी थोड़ी कर सकते हैं वो 10 के साथ रह ले हम ऐसा थोड़ी कर सकते हैं।
सही है ऐसा करना भी नहीं चाहिए हमारी सीमाएं , हमारी मर्यादा हमे सदैव ध्यान रखनी चाहिए । पर यह सिर्फ स्त्री के लिए ही नहीं वरन पुरुषों के लिए भी लागू होना चाहिए। तभी समाज में महिला - पुरुषों के बीच की असमानता को मिटाया जा सकता हैं।
7 टिप्पणियाँ
वाह बहुत खूब संदेश
जवाब देंहटाएंबुद्ध जी ने उस स्त्री घर पहुच कर भोजन भी किया
उस स्त्री का नाम अरम्पली था
उस स्त्री ने बुद्ध से कहा था में बड़ी पातकी हु इस शरीर ने बहुत पाप किये है आप मेरे हाथ का भोजन ग्रहण न करें
तब बुद्ध जी ने कहा की है देवी तुम्हे इन समाज के पुरूष ने पातकी बनाया है तुम पातकी नही हो और तुमने यह मान कर ही अपने किये पाप सुब धो लिए
जी अमन जी
हटाएंनारी का सम्मान अब सिर्फ परंपरा और किताबों में लिखी बातों तक ही सीमित रह गया है। तुच्छ मानसिकता के लोग अधिक है जिनके लिए स्त्री उपभोग की वस्तु मात्र है। आपके विचारों से मैं सहमत हूं।
जवाब देंहटाएंइस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
जवाब देंहटाएंइस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
जवाब देंहटाएंBehad sahi aur satik lekh he.. Keep it up.. God bless u.
जवाब देंहटाएंThanks didi 😊
हटाएंThanks for reading😊🙏🏻
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