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वेलेंटाइन डे


 

साँझ ढलने को थीं। जाड़ो में दिन छोटे औऱ रात लंबी हो जाती हैं , उतनी ही लंबी जितनी ऑफिस से घर को जाती सड़क। दूधिया स्ट्रीट लाइट से रोशन होता शहर बेहद खूबसूरत लगता हैं। सत्रह किलोमीटर दूरी तय करके घर पहुँचकर ऐसा महसूस होता मानों ऑफिस से नहीं अंतरिक्ष की यात्रा करके लौटी हुँ। घर पहुँचते - पहुँचते रात गहरा जाती। कमरें में पसरा घुप्प अंधेरा ऐसा लगता मानों रात ने मेरे ही घर डेरा डाल रखा हों। मुझें बचपन से ही चांद - तारे बहुत पसंद हैं , इसलिए अपने शहर से रेडियम के चांद - तारे साथ ले आई थीं औऱ छत पर लगीं खूँटी पर कुछ इस तरह लगा दिये थे कि जब भी दरवाजा खोलों तो रोशनी की बूंदो से चमकते सितारे ऑफिस की सारी थकान छूमंतर कर दे। मैं दरवाज़े का ताला खोलकर सबसे पहले कमरे में टँगे टिमटिमाते चांद तारों को देखती फिर चारों ओर फैले अंधेरे को बत्ती जलाकर विदा कर देतीं।

अंधेरे को विदा करना तो बहुत आसान था। एक स्वीच ऑन किया औऱ कमरा रोशनी से सराबोर हो जाता , पर कमरे में छाई तन्हाई को कैसे विदा करतीं..वो तो जैसे परछाई की तरह हमेशा मेरे साथ ही रहतीं। तन्हाई भी बिन बुलाए मेहमान की तरह होतीं हैं, जो जाने का नाम ही नहीं लेती।मैंने बहुत कोशिश की इस दिनों-दिन बढ़ते खालीपन से निपटने की ; किताबें पढी , गीत - गजलें सुनी पर कोई भी तरीका काम नहीं आया। अब तो तन्हा दिल किसी लाईलाज बीमारी की तरह लगने लगा हैं। जो प्राण छूटने पर ही साथ छोड़ेगा।

हमेशा चिडियों की तरह चहकने वाली मैं बातूनी सी लड़की ऐसे चुप हो गई जैसे दर्जी ने होठों को सिल दिया हो। इन सबकी वजह सिर्फ़ मेरा अतीत हैं।

ठंड की रात में सन्नाटा औऱ भी गहरा जाता हैं । सन्नाटे में डूबा घर का कोना-कोना मेरे दिल की बैचेनी ज़ाहिर कर रहा था । मन का खालीपन ऐसा था मानो चन्द्रमा के गहरे गड्ढे हो। मैं खामोशी से खिड़की के काँच से सर टिकाकर बाहर देखने लगीं। मेरे मन की तरह ही शहर की स्थिति थीं , सुनी सड़कें , सड़क के किनारे कतार में चुपचाप खड़े यूकेलिप्टस के पेड़ औऱ बेतरतीब बिखरी सूखी पत्तियां।

वक़्त गुजर जाता है पर यादें नहीं गुज़रती , कमबख्त यादें मन के किसी कोने में ठहर जाती हैं। मैं यादों के रथ पर सवार हो पहुँच गई थीं अपने सुनहरे अतीत में...

वो बरसात के दिन थे , या यूं कहूं कि मेरे औऱ रघुबीर के इश्क़ के शुरुआती दिन थे । हल्की बूंदाबांदी हो रहीं थीं। मैं आसमान की ओर चेहरा किए हुए आंखे मूंदे बारिश की बौछारो का लुफ़्त ले रहीं थीं। तभी रघुबीर ने छाता मेरी ओर करतें हुए नाराज़ होकर कहा - अब बस भी करो देवी जी ! आज ही अगस्त्यमुनि की तरह सारी बारिश पी लोगी या अन्य जीवों के लिए भी कुछ बूंदे बख्श दोगी..?

चलो भी देखों तो ज़रा घनघोर घटाओं को...अगर तेज़ बारिश हो गई तो घर पहुंचना मुश्किल होगा।
चिंता की लकीरें उसके माथे पर उभर आई ।

मैंने खिलखिलाकर हँसते हुए रघुबीर से कहा - अगर रंग होता तो तुम्हारे माथे पर बनी इन लकीरों को तीन रंगों से रँग देती औऱ बना देतीं  - "तिरँगा"

रघुबीर के चेहरे पर गर्व के भाव आ गये , गर्व से उसका सीना फूल गया वो बोला - तिरँगा तो मेरी रग - रग में लहराता हैं।

मैंने रघुबीर के माथे को चूमते हुए कहा - इसीलिए तो तुमसे इतना प्यार करतीं हुँ।

वो गम्भीर होकर बोला - कभी तिरंगे में लिपटा हुआ आऊं तब भी मुझ पर ऐसे ही प्यार लुटाना।

मैंने झट से अपनी उँगली रघुबीर के होंठों पर रखते हुए कहा - ऐसा न कहो , हम हमेशा साथ रहेंगे।

वो हल्का सा मुस्कुरा दिया औऱ अपनी बाहों में भरकर मुझसें बोला - ये हाथ नहीं प्रेम की जंजीरे है जो इतनी आसानी से छूटेगी नहीं।

मैं नखरे दिखाकर झूठमुठ का नाराज होते हुए बोली - "तुम मुझसें इस तरह की बात मत किया करों।"

हँसते हुए रघुबीर ने कहा - बेवकूफ लड़की ! तुमसे समझदारी वाली बातों की उम्मीद में करता भी नहीं। तुम हमेशा ऐसे ही रहना सिया..तितलियों सी चंचल। मैं तुम्हें हँसते मुस्कुराते देखता हुँ तो सुकून मिलता हैं। वादा करो कभी इन आँखों से आँसू न बहने दोगी।

मैंने चुटकी लेते हुए कहा - जो तुमको हो पसन्द वहीं बात करेंगे...

यूं ही हँसते-मुस्कुराते हम घर तक आ गए। मैंने रघुबीर से घर आने को कहा। फिर कभी आऊँगा कहकर रघुबीर वहाँ से चला गया। मैं दूर तक रघुबीर की गाड़ी को देखती रही। मम्मी ने भीतर से आवाज़ लगाई - अरे सिया तुम लोग आ गए..?जल्दी से अंदर आ जाओ दोनों..अदरक वाली चाय बनाई हैं।

मैंने रघुबीर की दूर जाती गाड़ी को देखते हुए कहा - रघुबीर चले गए मम्मी !

मम्मी ने मुझे टोंकते हुए कहा - "चले गए ऐसा नहीं कहते सिया..फिर आएंगे कहो ।"

मेरा शरीर सुन्न पड़ गया। शायद बारिश में भीगने से...या फ़िर मम्मी की बात से... ये रघुबीर औऱ मम्मी आज कैसी बाते कर रहें हैं ? खीझकर मैं अपने कमरे में चलीं गई। ड्रेस चेंज करने के बाद मैं बिस्तर पर लेट गई। फोन पर मैसेज बीप बजी। रघुबीर का मैसेज था। मैसेज में लिखा था...

सुनो ! कल वेलेंटाइन्स डे है , तुम तैयार रहना। कल हम कहीं घूमने चलेंगे।

मैं नख़रे दिखाना चाहती थीं । मना कर देतीं ,पर अंतर्मन ने कहा - पता नहीं रघुबीर फिर कब आए..जो भी पल मिले हैं उन्हें जी-भरकर जी लो।

मैसेज बीप ने मुझें ख्याली दुनिया से बाहर कर दिया। रघुबीर ने लिखा - एक हाँ के लिए भी पंडित जी से मुहूर्त निकलवाने की जरूरत होंगी ..?

मैंने फनी ईमोजी भेजते हुए - हाँ लिख दिया।

शुभरात्रि बेवकूफ लड़की कहकर रघुबीर ऑफलाइन हो गए। मैं मोबाईल स्क्रीन को अपलक देखती रही।

ग्वालियर की अलसाई सी भोर में चहकते पक्षियों के शोर से मेरी नींद खुल गई। मैंने समय देखने के लिए मोबाईल देखा तो नोटिफिकेशन में रेड रोज़ के साथ रघुबीर का मैसेज था - आई लव यू बेवकूफ लड़की !

मैं हल्के से मुस्कुरा दी ,औऱ 'लव यू टू' लिखकर एक स्माइली भेज दिया। उधर से तुरंत जवाब आया - बिना लाल गुलाब के इज़हारे - मोहब्बत स्वीकार नहीं कि जाएगी।

मैंने शरारती लहज़े में लिख दिया - ठीक हैं , जो लाल गुलाब दे उसी को ढूंढ लीजिए जनाब ।

रघुबीर का रिप्लाई आया - हम एक औऱ साल इंतज़ार कर लेंगे मोहतरमा आपके गुलाब का , पर गुलाब आपसे ही लेंगे।

मैंने कहा - देखते हैं।

रघुबीर ने लिखा - जी बिल्कुल , देख लीजिएगा पर मेहरबानी करके अभी आप तैयार होकर जल्दी से आईए । मैं दस मिनट में आ रहा हूँ।

मैंने हैरान होकर कहा - बस दस मिनट..?

रघुबीर - जी , तुम्हें करना ही क्या है , कितना भी मेकअप कर लो दिखोगी बेकार ही ..उसने एक साथ कई सारे हँसते हुए इमोजी के साथ लिखा।

मैं बिना जवाब दिए तैयार होने चली गई। दस मिनट में रघुबीर सच में घर आ गए। मैंने हल्के गुलाबी रंग की साड़ी पहनी औऱ बालों को बांध लिया। मुझें देखकर रघुबीर ने भौहें उचकाते हुए कहा - हम्म ...नॉट बेड लुकिंग गॉर्जियस !

मैं बस मुस्कुरा दी। रघुबीर ने कार का दरवाजा कुछ इस अंदाज में खोला जैसे मैं कोई राजकुमारी हुँ औऱ वो मेरे दरबान।

मैंने इतराते हुए कहा - तो बताईए कहाँ की सैर करवा रहें हैं आप ?

रघुबीर ने मजाकियां अंदाज़ में कहा - जहाँ मेरे दिल की मलिका जाना चाहें , वैसे हमने तो आज गुज़री महल जानें का सोचा हैं।

मैंने ख़ुश होकर कहा - वाह , प्रेम की निशानी !

प्रेम की एक निशानी लाल गुलाब भी होता हैं , वो तो तुम्हें देना नहीं हैं - हँसकर रघुबीर ने मुझें देखते हुए कहा औऱ कार स्टार्ट कर दी।

कार सुंदर रास्तों से होतीं हुई तेज़ रफ़्तार से आगे बढ़ रहीं थीं। रघुबीर अलग ही अंदाज़ में लग रहें थे। बातचीत में उन्होंने भविष्य की कई योजनाएं बताई। बातों ही बातों में मैंने भी अपनी जम्मू जानें कि इच्छा जाहिर कर दी। रघुबीर ने कहा - अगले साल का वेलेंटाइन्स डे हम वहीं मनाएंगे।

हम लोग गुज़री महल कब पहुँच गए पता ही नहीं चला । क़िले के रास्ते ढ़लान के किनारे एक फूल वाला सुर्ख लाल गुलाबों का गुलदस्ता लिए हुए बैठा था । लाल गुलाब पर पानी की बूंदे सूर्य की धूप से हीरे की तरह चमक रहीं थीं। रघुबीर ने वहाँ से एक गुलाब लिया औऱ फिर बड़े ही अदब से मुझें देतें हुए कहा - " मुझसें शादी करोगी ..?"

हमारे आसपास से गुज़रते हुए लोग ठहर गए । मुझें भी महसूस हुआ जैसे वक़्त ठहर गया हों। अचानक से जैसे मौसम बदल गया , सूरज मद्धम लगने लगा , आसमान सतरँगी हो गया औऱ चारों औऱ ख़ुशनुमा सा नज़ारा...लगा जैसे रघुबीर ने कोई जादुई झड़ी घुमा दी हो। हवाओं में रघुबीर का प्यार घुलने लगा। मन में सैकड़ो वाद्ययंत्र बज उठें।

मेरे चेहरे पर मुस्कान थी औऱ आँखों में नमी । आँखों से आँसू की बूंदे कुछ इस तरह ढुलकी मानो सिप से मोती । मैंने गुलाब लिया और रघुबीर को गले से लगा लिया। रघुबीर जैसा जीवनसाथी नसीब से ही मिलता हैं।

पूरा दिन मैं रघुबीर के साथ रहीं , वेलेन्टाइन्स डे का यह दिन मेरी ज़िंदगी का सबसे खूबसूरत औऱ यादगार दिन था। हर एक लम्हा खुशियों से भरा , प्यार से सराबोर , शहद सा मीठा ।

आज रघुबीर एक नए अवतार में दिखे। लेफ्टिनेंट रघुबीर भार्गव का जो रूप मैं देख रहीं थीं वो शायद किसी औऱ ने कभी न देखा होगा। हमेशा धीर- गम्भीर , अनुशाषित से रहने वाले रघुबीर आज बिल्कुल मजनू से लग रहें थे , जिन्हें प्यार के सिवा कुछ आता ही न हों।

रघुबीर का पहला प्यार माँ भारती हैं । सेना में भर्ती के लिए उनका जुनून किसी सिरफिरे आशिक़ की तरह था। रघुबीर का परिवार चाहता था कि वो इंजीनियरिंग करें पर रघुबीर का लक्ष्य अपनी भारत माता की सेवा करना था औऱ उन्होंने वहीं रास्ता चुना जिसकी मंजिल भारत माता हैं।

रघुबीर की छुट्टियां ऐसे ख़त्म हो गई जैसे गर्मी से पिघलती बर्फ़। विदा लेते रघुबीर की आँखों में पहली बार चमक की जगह सूनापन महसूस किया था मैंने। मैं भी अपनी आँखों को बार-बार झपका रहीं थीं , आँसुओं को छुपाना चाह रहीं थीं। रघुबीर सबसे मिल रहें थे। सभी बहुत भावुक हो गए थे। रघुबीर ने माहौल को हल्का करने के लिए हँसते हुए कहा - अरे ! आप सब तो ऐसे चेहरे बनाये हुए हो जैसे मुझें नहीं अपनी बेटी को विदा कर रहें हो ,मैं जल्दी लौटूंगा।

मुझें जब रघुबीर ने गले से लगाया तो मैं अपने आँसू रोक नहीं पाई। रघुबीर की नीली शर्ट मेरे आंसुओं से भीग गईं। खुद को संभालते हुए रघुबीर ने कहा - बेवकूफ लड़की ! अपना वादा याद रखना , इन आँखों से आँसू बहने न देना।
अबकी बार जब आऊंगा तो घोड़ी पर बैठकर आऊंगा..तैयार रहना...

मैं हल्का सा मुस्कुरा दी। मैं रघुबीर के साथ स्टेशन तक गई। रघुबीर की ट्रेन के आने से लेकर उनके ट्रेन पर चढ़ने तक मैं उनका हाथ थामे रहीं।हाथ छोड़ते समय ऐसा महसूस हुआ जैसे प्राण छूट रहें हों। रघुबीर की ट्रेन धीरे - धीरे चलते हुए रफ़्तार पकड़ने लगीं। रघुबीर दूर तक हाथ हिलाते रहें..

रेलगाड़ी के साथ ही मेरा चैन - सुकून सब कुछ चला गया। प्लेटफार्म की तरह ज़िंदगी सुनी सी लगने लगीं। मैं घर की ओर चल पड़ी। आसपास हँसते , बोलते लोगों के बीच खुद को बहुत अकेला महसूस कर रहीं थीं मैं। कुछ हैं जो पीछे छूट रहा हैं..बहुत पीछे। अचानक से लगा जैसे कोई आवाज़ दे रहा हो मुझें । फिर अपना ही नाम हवाओं में तैरता हुआ कानों तक महसूस हुआ। लगा जैसे रघुबीर ने मेरा नाम पुकारा हों..
मैंने झटके से पलटकर देखा..अनजान चेहरों के सिवा वहाँ कोई न था। मैं घर लौट आई।

दिन बीत रहें थे रघुबीर के इंतजार में...
इस बार इंतज़ार बेसब्री से था...
दिन धुँए की तरह हवा हो गए। दिसम्बर की सर्द शाम को रघुबीर का फोन आया। चहकते हुए वो बोले - " सिया ! पता हैं मेरी पोस्टिंग कहाँ हो रहीं है ?

मैंने भी उत्सुकता से पूछा - " कहाँ ?"

"जम्मू" - रघुबीर की आवाज़ से उनकी ख़ुशी का अंदाज़ा लग रहा था। वो बोले फरवरी में हमारी शादी हैं औऱ मैंने तुमसे कहा भी था अगले साल का वैलेंटाइन्स डे जम्मू में ही मनाएंगे।

मैंने कहा - पर हमारी शादी तो 28 फ़रवरी की हैं !

रघुबीर ने कहा - तो क्या हुआ..? तुम यहाँ आ जाना , वेलेंटाइन्स डे मनाकर दोनों साथ चलेंगे ग्वालियर।

मैंने कहा - नहीं , आप ही आना , मुझें आपकों लाल गुलाब भी तो देना हैं।

रघुबीर ने मुझें समझाते हुए कहा - यार , सिया मैं कैसे आ सकता हूँ..? मुझें छुट्टी शादी के लिए मिली हैं। मैं 20 तक आऊँगा।

मैंने नाराज़ होकर कहा - मुझें कुछ नहीं सुनना , आप आओगे मतलब आओगे।

रघुबीर ने भी झल्लाकर कहा - बहुत ज़िद्दी हो सिया तुम कसम से। ठीक हैं मैं देखता हूँ।

वो दिन भी कितने रंगीन हुआ करतें थे बिल्कुल तितलियों से। मैं हमेशा अपनी मनमानी करतीं औऱ रघुबीर मेरी हर बात मान लेते। मैं अक्सर झुठमुठ में रूठ जाती औऱ हर बार वो मुझें प्यार से मना लेते।

काश ! हर बार ऐसा ही होता...
हम जैसी ज़िंदगी चाहतें हैं वह हमें मिलती नहीं हैं।

जनवरी में रघुबीर की पोस्टिंग जम्मू हो गई।
हम दोनों अपनी शादी के दिन गिनते। मैं रघुबीर से कहती अब तो एक महीना ही बचा हैं फिर भी दिन ऐसे जान पड़ते है जैसे दिन न हो आसमान के तारें हो गए ..गिनती खत्म ही नहीं होतीं ।

रघुबीर हंसकर कहते - हाँ क्योंकि तुम हो बेवकूफ लड़की ! तुम्हें गिनती आती भी हैं ..?

मैंने भी मजाकिया अंदाज़ में अपनी एजुकेशन बता दी। अचानक रघबीर गम्भीर हो गए वो कहने लगें - सिया , मेरा पैतृक गाँव हैं , जहाँ दादाजी का ऑफिस हैं। दादाजी स्वतंत्रता सेनानी थे औऱ उनकी इच्छा थीं कि उनके गाँव से हर एक बच्चा भारत माता की सेवा करे। दादाजी की इच्छा थीं कि मैं उस ऑफिस में काम करूँ जो कि मैं करूंगा भी पर....कहकर रघुबीर चुप हो गए।

मैंने पूछा -" पर...??"

रघुबीर ने गहरी सांस लेते हुए कहा - पर यदि मैं नहीं रहा तो तुम मेरा यह काम करोगी।

मैं इस बात पर चिढ़ गई । गुस्से से मैंने कहा - मुझसें इस तरह की फालतू बातें मत किया करों।

रघुबीर ने खिलखिलाकर हँसते हुए कहा - अच्छा बाबा अब माफ़ भी करो , नही करूंगा ऐसी बात।बस मेरी इस बात को याद रखना। इसके बाद रघुबीर जम्मू की जगह के बारे में बताने लगें। हम दोनों अक्सर फोन पर शादी को लेकर बात करतें । दिन बीतते गए औऱ फ़रवरी का महीना भी आ गया। 13 फ़रवरी को रघुबीर का फ़ोन आया। कह रहें थे कि मैं कल आ नहीं पाऊँगा सिया , तुम ही आ जाओ न प्लीज़ !

मैंने भी कोई विरोध नहीं किया औऱ जम्मू जानें के लिए हामी भर दी।

रघुबीर ने कहा - लो जी , पहले ही बता देतीं तो मैं आज से छुट्टी सेंशन नहीं करवाता।

हैरत औऱ ख़ुशी दोनों भाव एक साथ मेरे चेहरे पर आ गए । मैंने रघुबीर से पूछा - तो क्या आप सच में कल आ रहें हैं ..?

रघुबीर ने फिल्मी हीरो की तरह कहा - जी , हम कल आ रहें हैं फिर उन्हीं इश्क़ की गलियों में.. दीदार की आरजू में कट गए दिन इन्तज़ार के...

मैंने फोन रखतें ही यह ख़बर पूरे घर में ऐसे सुनाई जैसे न्यूज चैनल वाले ब्रेकिंग न्यूज़ सुना रहें हों। मैं दौड़कर रघुबीर के घर तक यह महत्वपूर्ण सूचना हाँफते हुए दे आई। रघुबीर के घर वाले मुझें देखकर हँस पड़े। बस इतना ही बोले - पगली !

मैं रघुबीर के आने की ख़ुशी में खुद से ज़्यादा घर को संवार रहीं थीं । उनकी पसन्द के रंग के पर्दे पूरे घर के दरवाजो औऱ खिड़कियों पर सज गए । मार्किट से उनकी पसन्द की फल , सब्जियां , मिठाई सब कुछ मैं खुद लेकर आईं। पूरा घर मैंने ऐसे सजा दिया जैसे दीवाली हो।

मेरी आँखों मे नींद की जगह असंख्य सपने थें। मैंने रात बारह बजे ही रघुबीर को मेसेज कर दिया - हैप्पी वेलेंटाइन्स डे माय लव ,माय वेलेंटाइन ।  इस बार लव नोट के साथ एक लाल गुलाब भी भेज दिया था मैंने।

रघुबीर का रिप्लाई आया - अरे वाह , इस बार तो सबसे पहले आपने विश करके बाज़ी मार ली। औऱ लाल गुलाब भी। लग रहा हैं कल बहुत कुछ ख़ास करने वाली हो।

मैंने कहा - खास तो आप ख़ुद हैं , आप आओ तो सही.. इस बार आपकों मैं सैर करवाउंगी।

रघुबीर ने कहा -अच्छा सिया , बाद में बात करता हूँ। लव यू...

सूर्योदय से पहले ही मेरी नींद खुल गईं। बाहर देखा तो आसमान हल्की सी लालिमा लिए हुए था । पक्षी का कलरव कानों को सुकून देने वाला था। मैं जल्दी ही तैयार हो गई थीं औऱ स्कूटी लेकर चल पड़ी थीं - 'लाल गुलाब ' लेने।

गुलाब लेकर मैं घर पहुँची। मैंने गुलाब फ्रीज में रख दिया औऱ पानी की बोतल लेकर हॉल में आ गई। सोफे पर बैठी ही थीं कि पापा हड़बड़ी में आए , उन्होंने जल्दी से रिमोट ढूंढा और काँपते हुए हाथों से टेलीविजन ऑन किया। यह सब देखकर किसी अनहोनी की आशंका से मेरा दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। टीवी ऑन हुआ..मैं आँखे गढ़ाए टीवी देखने लगीं। तब तक परिवार के बाक़ी सदस्य भी हॉल में इकट्ठा होने लगें। पापा ने जैसे ही न्यूज चैनल ट्यून किया - एंकर की आवाज़ कानों में गूँजी - इस वक्त की बड़ी खबर , जम्मू में हुआ हैं आतंकी हमला..हमले में कई जवानों के शहीद होने की आशंका हैं ,, सीधे रूख करेंगे हमारे संवाददाता से....

आगें का सुनने से पहले मैं बेहोश हो गईं। घर मे अफरा-तफरी मच गई। जैसे कोई भूचाल आ गया। रघुबीर के घर से रोने की तेज़ आवाज़ सुनकर मम्मी रघुबीर के घर की ओर दौड़े। मैं बेसुध पड़ी रहीं। किसी को किसी का ख्याल नहीं ..कौन किसको संभाले..? डॉक्टर को कॉल करके घर बुलाया गया। मुझें जब होश आया तब तक न्यूज़ की सुर्खियों में एक नाम गूंज रहा था - लेफ्टिनेंट रघुबीर भार्गव हुए शहीद...कई जवान हुए जख्मी ।

मैं जैसे पत्थर की मूर्ति बन गई..भावना शून्य , दिमाग ने जैसे काम करना ही बंद कर दिया । होंठ काँपने लगें पर मुंह से शब्द नहीं निकलें।
आँख फटी की फटी रह गईं। अचानक आँखों के आगें अँधेरा छा गया।

दोपहर के तीन बज रहें थें । बाहर लोगों का हुजूम लगा हुआ था। लोगों का शोर सुनाई दे रहा था - वीर जवान अमर रहें ..वन्देमातरम..जब तक सूरज चांद रहेगा रघुबीर तेरा नाम रहेगा....

मुझें मम्मी लेने आए उनकी नजरें झुकी हुई थीं
वो बोली - चल सिया , रघुबीर को ले आए हैं...
बहुत भारी थे ये शब्द..मैंने मम्मी से कहा - ऐसा नहीं कहते मम्मी रघुबीर को ले आए नहीं ,  वो ख़ुद आएं है..मेरी उनसे बात हुई हैं।

मम्मी आँचल से मुँह छुपाकर बोली - अब वो कभी नहीं आयेंगे सिया....कहते हुए मम्मी बाहर निकल गए।

मैं ख़ुद से बुदबुदाते हुए बोली - वो कही नहीं गए..यहीं हैं , यहीं रहेंगे..हमेशा मेरे साथ , मेरे पास...

बाहर शोर तेज़ हो गया - रघुबीर अमर रहें ..अमर रहें...जब तक सूरज चांद रहेगा , रघुबीर तेरा नाम रहेगा....

रघुबीर की बाते मेरे कानों में गूँजने लगीं-इन आँखों से आँसू बहने न देना..दादाजी के ऑफिस का काम तूम देखना..इस बार जब आऊंगा तो घोड़ी पर बैठकर आऊंगा...लाल गुलाब तो तुमसे ही लुँगा....

'लाल गुलाब' - मैं दौड़कर फ्रीज की ओर गई। फ्रीज से लाल गुलाब निकाला औऱ बाहर की तरफ कदम बढ़ा दिए।

मैंने देखा भीड़ के बीचोबीच तिरंगे से लिपटा ताबूत था।

रघुबीर के शब्द बरबस ही किसी कैसेट की तरह बजने लगें - " कभी तिरंगे से लिपटा हुआ आऊं तब भी इतना ही प्यार लुटाना...

आँसुओं से भरी आँख ..पर आँसू का एक कतरा भी रघुबीर के वादे के कारण न गिर सका।

मैंने लाल गुलाब तिरंगे में लिपटे हुए रघुबीर को अदब से दिया । वेलेंटाइन्स डे पर आने का वादा रघुबीर ने ख़ूब निभाया....

अतीत की यादों से निकलकर मैं वर्तमान में आ गई....जैसे रघुबीर की रग-रग में तिरंगा लहराता था वैसे ही रघुबीर का प्यार मेरी रग - रग में बहता हैं। रघुबीर की तरह ही मेरा प्यार भी अमर हो गया ।।

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