आप सभी को गुरुपूर्णिमा की शुभकामनाएं । आज के अपने इस ब्लॉक् में मैं गुरु के बारे में बात करूँगी । मैं उज्जैन शहर से हुँ औऱ उज्जैन भगवान कृष्ण की विद्यास्थली रहीं हैं । तो गुरु के महत्व को गीता के माध्यम से जानेंगे। गीता का महाज्ञान जिसका हर मनुष्य के जीवन में बड़ा महत्व है। भगवान ने जब धरती पर अवतार लिए तब उन्होंने भी गुरु बनाए और उनसे मार्गदर्शन प्राप्त किया। अब कई लोगों के मन में यह प्रश्न उठता है कि गुरु कौन हो ? इस संबंध में भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में उत्तर दिया है। यूं तो मनुष्य के जीवन की प्रथम गुरु माँ होती है। फिर आवश्यकता होती है एक ऐसे गुरु की जो हमें व्यवहारिक ज्ञान दे। सांसारिक ज्ञान की शिक्षा दे। एक मनुष्य के जीवन में कई गुरु हो सकते है। मनुष्य स्वयं का गुरु हो सकता है या नहीं इस लेख के माध्यम से हम इस पर ही बात करेंगे। उससे पहले हम कुछ जान लेते है। तो गुरु के चरणों में हम प्रणाम करते है।
भारतीय संस्कृति पुनर्जन्म एवं कर्म सिद्धांत पर आधारित है। मनुष्य अपने वर्तमान जीवन में जो भी अच्छा या बुरा कर्मफल प्राप्त करता है, शास्त्रों के अनुसार वह उसके प्रारब्ध कर्मों के कारण निश्चित होता है। 84 लाख विभिन्न जन्मों में किये कर्मों अथवा संस्कारों के पुण्य कर्मों से प्रारब्ध बनता है। वेदानुसार, वर्तमान जीवन में मनुष्य धर्म, अर्थ, काम, मोक्षादि चारों पुरुषार्थों के द्वारा आगामी कर्मों को करते हुए, सुख, शांति, स्वास्थ्य प्राप्त करके अपने जीवन को सफल और उन्नत बना सकता है।
किसी विषय में हमें जिससे ज्ञानरूपी प्रकाश मिले, हमारा अज्ञान का अंधकार दूर हो, उस विषय में वह हमारा गुरू है। इसी तरह, जो ज्ञानी या सतपुरूष हमें धर्मशास्त्रों के ज्ञान से और परमात्मा के सम्मुख यानि संबंध जोड़ता है, वही सच्चा गुरु हो सकता है। गुरु का काम मनुष्य को अपने साथ नहीं, परमात्मा के साथ संबंध जोड़ने का होता है। भगवान के साथ तो हमारा संबंध सदा से और स्वाभाविक है, क्योंकि हम भगवान के सनातन अंश हैं। गीता अध्याय 15, श्लोक 7 में भगवान स्वयं कहते हैं, हे अर्जुन 'ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातन:।' अर्थात इस संसार में जीव बना हुआ आत्मा मेरा ही सनातन अंश है। जीवन का परम सत्य तो ये ही है, भेजा भी उसने है और जाना भी उसी के पास है। गुरु केवल उस भूले हुये संबंध की सिर्फ याद कराता है, कोई नया संबंध नहीं जोड़ता।
गीता के अनुसार गुरु की व्याख्या
'गुकारश्चान्धकारो हि रुकारस्तेज उच्यते।
अज्ञानग्रासकं ब्रह्म गुरुरेव न संशयः।।'
गीता के अनुसार 'गु' नाम अंधकार का है और 'रु' नाम प्रकाश का है, अतः जो अज्ञानरूपी अंधकार को दूर कर दे वही ही गुरु है। जिसके मन में धन की इच्छा होती है, वह धनदास होता है और ऐसे ही जिसके मन में चेले बनाने की इच्छा होती है, वह चेलादास होता है। 'सिद्ध पुरुष प्रसिद्धि नहीं चाहता और प्रसिद्ध पुरुष सिद्ध नहीं हो सकता।' जो सच्चे संत-महात्मा होते हैं, उनको गुरु बनने का शौक नहीं होता, अपितु समस्त मानवता और संसार के कल्याण की लगन होती है।
यह सिद्धांत है, कि जो दूसरे को कमजोर बनाते हैं, वह खुद ही कमजोर होते हैं। जो दूसरे को समर्थ बनाते हैं, वह खुद समर्थ होते हैं। भगवान सबसे बड़े हैं, इसलिए वे किसी को छोटा नहीं बनाते। जो भगवान के चरणों की शरण हो जाता है, वह संसार में बड़ा हो जाता है। भगवान सबको अपना मित्र या सखा बनाते हैं, अपने समान बनाते हैं, किसी को अपना चेला नहीं बनाते। जैसे, निषादराज, विभीषण, सुग्रीव, हनुमानजी, अर्जुन इत्यादि। श्रीमद्भागवत में कहा गया है 'आत्मनो गुरुरात्मैव पुरुषस्य विशेषतः' अर्थात् मनुष्य आप ही अपना गुरू है। हमारा विवेक ही हमारा गुरु है, भक्ति, ध्यान से हमारा विवेक जागृत होता, जो निरंतर बढ़ते-बढ़ते तत्त्वज्ञान में परिवर्तित हो जाता है।
3 टिप्पणियाँ
Bahut hi achchi baat batai aapne apne blog se. Or bahut hi sargarbhit or spasht shabdo me.
जवाब देंहटाएंVery motivational blog dii
जवाब देंहटाएंबहुत बढ़िया ऐसे ही लगे रहो
जवाब देंहटाएंThanks for reading😊🙏🏻
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