नमस्कार
आज के इस ब्लॉग में मैं बात करूँगी की शिवपुराण में वर्णित कथा के विषय में, जिसमे शिवलिंग पर शंख से जल चढ़ाने को वर्जित माना गया हैं।
हिन्दू धर्म शास्त्रों के अनुसार, पूजन कार्य में शंख का उपयोग महत्वपूर्ण माना गया है। इसी तरह लगभग सभी देवी-देवताओं को शंख से जल चढ़ाने का विधान है लेकिन शिवलिंग पर शंख से जल चढ़ाना वर्जित किया गया है। धर्म शास्त्रों के अनुसार, भोलेनाथ की पूजन विधि सबसे ज्यादा सरल है। वे शिवलिंग पर मात्र जल चढ़ाने से ही प्रसन्न हो जाते हैं। शिवजी को शुद्ध जल व शीतल चढ़ाने से वे भक्त के जीवन में आने वाले ताप-संताप को दूर कर देते हैं।
यूं तो देवी-देवताओं के पूजन में शंख बजाया जाता है और आरती में भी उसका उपयोग होता है। आपने कई लोगों को देखा होगा कि वो शंख के द्वारा शिवलिंग पर जल चढ़ाते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं? शिवलिंग पर शंख से जल चढ़ाने को निषेध माना गया है। शंख से अर्पित किया गया जल अत्यंत पवित्र होता है, परंतु भगवान शिव को शंख से जल अर्पित करने का निषेध है। शंख से शिवजी को जल क्यों अर्पित नहीं करते हैं? इस संबंध में शिवपुराण में एक कथा बताई गई है। तो आइये जानते है थोड़ा उस धार्मिक कहानी के बारे में विस्तार से।
शिवपुराण शंख कथा
शिवपुराण के अनुसार शंखचूड नाम का महापराक्रमी दैत्य हुआ। शंखचूड दैत्यराम दंभ का पुत्र था। दैत्यराज दंभ को जब बहुत समय तक कोई संतान उत्पन्न नहीं हुई, तब उसने भगवान विष्णु के लिए कठिन तपस्या की। तप से प्रसन्न होकर विष्णु प्रकट हुए, विष्णुजी ने वर मांगने के लिए कहा तब दंभ ने तीनों लोको के लिए अजेय एक महापराक्रमी पुत्र का वर मांगा। श्रीहरि तथास्तु बोलकर अदृश्य हो गए, तब दंभ के यहां एक पुत्र का जन्म हुआ जिसका नाम शंखचूड़ पड़ा।
शंखचुड ने पुष्कर में ब्रह्माजी के निमित्त घोर तपस्या की और उन्हें प्रसन्न कर लिया। ब्रह्मा ने वर मांगने के लिए कहा तब शंखचूड ने वर मांगा कि वो देवताओं के लिए अजेय हो जाए। ब्रह्मा जी से बरदान प्राप्त कर शंखचूड अत्यंत शक्तिशाली हो गया। उसे कृष्णकवच की भी प्राप्ति हो गई। साथ ही ब्रह्मा ने शंखचूड को धर्मध्वज की कन्या तुलसी से विवाह करने की आज्ञा दी। फिर वे अंतध्र्यान हो गए।
ब्रह्मा की आज्ञा से तुलसी और शंखचूड का विवाह हो गया। ब्रह्मा और विष्णु के वरदान के मद में चूर दैत्यराज शंखचूड ने तीनों लोकों पर स्वामित्व स्थापित कर लिया। देवताओं ने त्रस्त होकर विष्णु से मदद मांगी, परंतु उन्होंने खुद दंभ को ऐसे पुत्र का वरदान दिया था अत: उन्होंने शिव से प्रार्थना की। तब शिव ने देवताओं के दुख दूर करने का निश्चय किया और वे चल दिए।
परंतु श्रीकृष्ण कवच और तुलसी के पातिव्रत धर्म की वजह से शिवजी भी उसका वध करने में सफल नहीं हो पा रहे थे तब विष्णु से ब्राह्मण रूप बनाकर दैत्यराज से उसका श्रीकृष्णकवच दान में ले लिया। इसके बाद शंखचूड़ का रूप धारण कर तुलसी के शील का हरण कर लिया। अब शिव ने शंखचूड़ को अपने त्रिशुल से भस्म कर दिया और उसकी हड्डियों से शंख का जन्म हुआ।
चूंकि शंखचूड़ विष्णु भक्त था अत: लक्ष्मी-विष्णु को शंख का जल अति प्रिय है और सभी देवताओं को शंख से जल चढ़ाने का विधान है। परंतु शिव ने चूंकि उसका वध किया था अत: शंख का जल शिव को निषेध बताया गया है। इसी वजह से शिवजी को शंख से जल नहीं चढ़ाया जाता है।
शास्त्रों में ऐसे अनेक प्रकार के शंखों का उल्लेख किया गया है जिनसे दरिद्रता का नाश होता है। शिव ने शंखचूड़ का संहार किया था। इसलिए अन्य देवी-देवताओं को शंख से जल चढ़ाया जा सकता है लेकिन शिवजी के पूजन में शंख से जल चढ़ाने का निषेध है।


2 टिप्पणियाँ
wah. achchi katha hai. aapka blog kafi achcha hai. roj nayi jankari milti hai. thanks
जवाब देंहटाएंबहुत खूब
जवाब देंहटाएंThanks for reading😊🙏🏻
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