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मीत (भाग-३)


 

हम जिस दुनिया में रहतें हैं उसके इतर भी एक दुनिया औऱ हैं " हमारी अपनी दुनिया जिसे हम अपने मन से बनाते हैं " जहाँ रिश्ते हैं , प्रेम हैं , मिलना हैं , बिछड़ना हैं , रूठना हैं , मनाना हैं पर बेबस कर देने वाली उलझनें नहीं हैं । शायद इसीलिए हमें अपने मन की दुनिया में रहना अधिक पसन्द हैं । हम इस दुनिया में खुश रहतें हैं। यहाँ कोई किसी को हर्ट नहीं करता। अचानक से मेरे मन में चल रहीं उथल-पुथल शांत हो गईं । रात के सन्नाटे में अब बस घड़ी की टिक-टिक ही सुनाई दे रहीं थीं ।

कितनी बोझिल थी ये चुप्पी। इस गहरे मौन में मेरा मन भी ठहर गया था। मैं अब कुछ भी नहीं सोच रही थी, ना सच, ना झूठ, ना नफ़रत, ना ही प्यार। जैसे ज़िन्दा होकर भी अपने लिए ख़त्म हो गयी थी।

हमारी उम्मीदों के महल जब धराशायी होंते हैं तब हम मौन हो जातें हैं , मन जैसे उजड़ सा जाता हैं।
शायद इसी को ज़िंदा होकर भी ख़त्म हो जाना कहते होंगे।

रात के 2 बज रहें थें। लगता हैं ये रात जागते हुए ही गुजरेगी , बिना चाय के ये रात कटेगी नहीं । मैं किचन में गई औऱ गैस पर चाय चढ़ा दी। मन हल्का करने के लिए मैंने म्यूजिक सिस्टम ऑन कर दिया। पहला ही गीत था - मीत न मिला रे मन का....

तमाम उदासियों औऱ मन में दबे गुस्से के बावजूद मैं मुस्कुरा दी । इसलिए नहीं कि गाने में मीत का नाम था..बल्कि इसलिए कि हम जिस बात से दूर जाना चाहते हैं उसी से सम्बंधित बात , नाम , किस्सा हमें हर कहीं सुनाई औऱ दिखाई देता हैं ।

मैं चाय का प्याला लेकर सोफ़े पर आकर बैठ गई । संगीत की धुन मद्धम हो गई औऱ अतीत की बातें याद आने लगीं । मीत की न जाने कितनी यादें है जो हौले हौले एक कली की पंखुड़ियों की तरह खुलती चली गई। पर ये वो यादें औऱ बातें हैं जिन पर पहले मैंने कभी ध्यान ही नहीं दिया । मसलन उसका बातूनी स्वभाव , उसका हर किसी से दोस्ती कर लेना , हमेशा सिर्फ अपने ही बारे में बातें करना , मुझसें बिना पूछें उसकी पसन्द का खाना ऑर्डर कर देना , हमेशा लोंगो के अनुसार रहना..कई मायनों में वो मुझसें बिल्कुल अलग था l मेरा उसके साथ रहने का फैसला अब कई सवाल खड़े कर रहा था। मेरी ज़िंदगी का नायक अब मुझें खलनायक लग रहा था ।

मेरे जेहन में मिसेज़ मेहता की बातें घूमने लगीं । वो मितेश को ज़रा भीं पसन्द नहीं करतीं थीं औऱ अक्सर मीत को लेकर मेरे कान भरा करतीं थीं। मैं मीत के खिलाफ एक शब्द भी नहीं सुन पाती थीं औऱ मिसेज़ मेहता को झिड़क दिया करतीं थीं। मेरी झिड़की सुनने के बाद भी वो यहीं कहती - सही लड़का नहीं हैं मितेश , तुम पछताओगी ।

क्या मिसेज़ मेहता सच कहती थीं..? पर अब भी मेरा मन उनकी बात से कोई ताल्लुक नहीं रखता था। मेरा सर दर्द से फट रहा था औऱ आँखे भारी होने लगीं थीं। कब नींद आ गई पता ही न चला।

डोरबेल की आवाज़ से नींद खुली। सुबह के 9 बज रहें थें। दरवाजा खोला तो दूधवाले भैया खड़े थें। मुझें देखते ही वो बोले - दीदी तबियत तो ठीक हैं न ?  मैंने हाँ कहा औऱ दूध लेकर अंदर आ गई।

मैंने बॉस को कॉल करने के लिए मोबाईल स्विच् ऑन किया तो मीत के संदेशों की झड़ी लग गई । उसने कई बार कॉल भी किया हुआ था। मैंने सन्देश को पढ़ने में कोई रुचि नहीं ली औऱ बॉस को कॉल करके ऑफिस से 3-4 दिन की छुट्टी का कहा और बॉस सहजता से मान गए। मैं कॉल पर ही थीं कि कॉल वेटिंग में मीत का कॉल था।

मेरे फोन रखतें ही मोबाईल फिर से बज उठा। मीत का ही कॉल था। अनमने मन से मैंने कॉल रिसीव किया । कहाँ हो तुम..? ऑफिस क्यो नहीं आई..? सब ठीक तो हैं न..? औऱ ये फ़ोन क्यों बंद था..? उसने एक ही सांस में सारे सवाल एकसाथ पूछ लिए थे। मैंने कहा - " तबियत ठीक नहीं हैं । वो गुस्से से बोला - तबियत ठीक न होने पर डॉक्टर को दिखाते हैं न कि मोबाईल बंद कर लेते हैं। मैं आ रहा हूँ तैयार रहना। फिर चलते हैं डॉक्टर के पास। इतना कह कर उसने फ़ोन कट कर दिया।

न चाहते हुए भीं मैं तैयार होंने लगी थीं । मैंने तय किया कि मीत से अपने मन की बात कह दूँगी। तभी हमारा आने वाला कल तय होगा। हम हमसफ़र रहेंगे या फ़िर दोनो के रास्ते अलग हो जाएंगे ? मैं आज की पीढ़ी के अनुसार बोरिंग हो सकती हूँ पर हम दोनों जब भी साथ रहें ज़िन्दगी खुशनुमा सी लगीं । पर अब मीत के लिए मेरी भावना बदल रहीं हैं..बदलतीं भावनाओं के बावजूद मन अब भी मीत से बंधा हुआ था। मीत हर बात में अच्छा था.. शायद मैं ही समझ नहीं पाई उसकी बात को। मन अब भी मीत की पैरवी कर रहा था।

मैंने अलमारी से हरे रंग की ड्रेस निकाली जो कपड़ो की तह में सबसे नीचे रखी हुई थीं । जबसे मीत मेरी ज़िंदगी का हिस्सा बना तबसे ही मैं उसकी पसन्द नापसंद के अनुसार ही तैयार होतीं थीं। पर आज मैंने हरे रंग की ड्रेस पहनी ,, हरा रँग मीत को बिल्कुल पसन्द नहीं था।

मैं मीत का इंतजार करने लगीं । वह ठीक 11 बजे आया। जैसे ही मैंने दरवाजा खोला वह मुझें हरे रंग की ड्रेस में देखकर चौंक गया पर बोला कुछ नहीं। मुझें देखकर वो बोला - " सोई नहीं ना रातभर " मैंने कहा - "जल्दी ही सो गई थीं"। पर तुम्हारी आँखे तो कुछ औऱ ही बता रहीं हैं मैडम जी - वो मुस्कुराकर बोला।

चलों अब जल्दी से बाहर आओ डॉक्टर से अपॉइंटमेंट ले लिया हैं मैंने - कहते हुए मीत सीढ़ियों की औऱ जानें लगा। मैंने मीत को आवाज़ लगाई औऱ कहा मैं ठीक हुँ । क्या हम बैठकर बात कर सकतें हैं...? मीत ने मुझें इस तरह से देखा जैसे मेरे चेहरे को पढ़ रहा हो । वो चुपचाप बिना कुछ कहे चला आया औऱ सोफ़े पर बैठ गया ।

मैं समझ ही नहीं पा रहीं थीं कि कैसे अपनी बात को कहूं । मुझें चुप देखकर वह बोला - कुछ बोलोगी भीं ..क्या हुआ हैं तुम्हें .. ऑफिस नहीं आ रहीं औऱ ये ड्रेस ..?? मोबाईल भी स्विच् ऑफ़ करके रखतीं हों ..भले ही कोई परेशान होता रहें ।

मैंने धीरे से कहा - मीत ! हम...दोनों एकदूसरे के लिए नहीं बनें हैं..औऱ मैं तुम्हारे साथ नहीं रह सकती ।

मेरी इस बात वह चुप रहा...लेकिन उसकी आंखों से आँसू छलक आए । उसने मेरे हाथ को थामते हुए कहा - साथ रहने के लिए प्यार जरूरी हैं ..
जो हम दोनों को एकदूसरे से बेशुमार हैं।

प्रिया ! हम इंसान बहुत डरपोक होते हैं….अपनों से दूर जानें का डर , अपनों को खो देने का डर ।पता नहीं औऱ भी कितने ही अनजान डर से हम अपनों को ही तकलीफ़ में डाल देते हैं… जैसे मैंने तुम्हें…” कहते-कहते मीत रुक गया । फिर कुछ पल बाद बोला -

“काश मैंने समझा होता तुम्हें ! तूमने खुलकर मुझे बताया होता, थोड़ा वक्त दिया होता मुझे…दूरी बना लेनेभर से क्या तुम मुझें भूल जाती..? बस इतनी सी बात नहीं कह सकी की मैं बिना शादी के साथ नहीं रहना चाहती ..

मैं तुम्हें खोंना नहीं चाहता हुँ , इसलिए हमेशा तुम्हें अपने पास अपने साथ रखना चाहता हुँ । जानता हुँ बिना शादी के साथ रहना तुम्हारे लिए आसान नहीं होगा । समाज भी स्वीकार नहीं करेगा । लोग क्या कहेंगे जैसा सवाल तुम्हें परेशान कर रहा होगा..मैं भी नहीं चाहता कि तुम मेरी जिंदगी में राधा बनकर रहो , मैं हमेशा यही चाहता रहा की तुम रुक्मिणी बनकर मेरी ज़िंदगी में आओ ।

“मैं हमेशा तुम्हारे साथ रहूँगा लेकिन तुम्हारी मुस्कुराहट के साथ! तूम वही चुनो जिसमें तुम्हारी ख़ुशी है…. समझी मेरी प्रिया !”

मीत से बात करने के बाद मुझें समझ आ गया था कि दुःख का बीज जो मेरे मन की मिट्टी में पनप रहा था वो अब प्रेम का विशाल वृक्ष बन गए हैं , जिसके तले मैं मीत के साथ आजीवन सुकून से रहूँगी ।

मैं मीत से कुछ भी नहीं बोल पाई, एक शब्द भी नहीं। बस मीत को देखती रहीं , औऱ मुस्कुरा दी । अरसे बाद दुःख की धूप मुस्कुराहट के बादलों ने ढक ली थी।

-----------------समाप्त--------------------

लेखिका - वैदेही वाटिका


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